शनिवार, 30 जून 2012

कांग्रेस कार्यकारिणी ने सोनिया गाँधी को ये अधिकार सौपा की वो राष्ट्रपति का उम्मीदवार तय करे और उन्होंने ऐसा किया भी.
लेकिन प्रशन ये है की क्या ये उचित था ? क्या हमें इसे मान लेना चाहिए?
वास्तव में ये एक तानाशाही की इस्थिति है की किसी देश के सर्वोच पद का निर्णय कोई पार्टी प्रमुख करे और आम जनता सिर्फ दर्शक बनी रहे.अगर ये लोकतंत्र की परिभाषा है तो फिर तानाशाही किसे कहते है?
कहने को तो राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल करता है जिसको जनता का समर्थन हाशिल होता है.लेकिन आज के परिदृश्य में ये कथन कही से उचित नहीं दीखता.

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