शनिवार, 30 जून 2012

राष्ट्रपति का उम्मीदवार किसे तय करना चाहिए देश की आम जनता को या राजनीतिक दल के प्रमुखों को. राजनीतिक दल जब अपने मरजी का राष्ट्रपति बनाते है तो रबर के स्टंप की धारणा और बलवती होती है.तथा राष्ट्रपति के कुछ अधिकार और नियंत्रण शक्ति भी राजनीतिक दलों के पास चली जाती है जो स्वतंत्र अवस्था में लोकतंत्र के प्रहरी का कम कर सकती है .ये क्षेत्र है-
१) राज्य,सीमा ,धन,संचित निधि और राज्य हित से जुड़े मामलों सेसम्बंधित विधेयक पेश करने से पहले राष्ट्रपति की सहमती.जो किसी भी राजनीतिक दल को राजनीतिक स्वार्थ वाले विधेयक को रोक सकता है.
२) अ:-. सर्वोच न्यायलय के मुख्या न्यायधीश की नियुक्ति.जो न्याय को राजनीती से मुक्त करने में सहायता करेगा.
ब:-.मुख्या चुनाव आयुक्त और चुनाव परीक्षक की नियुक्ति.
स:-.महान्यायवादी की नियुक्ति.
द:-.नियंत्रक और महा लेखा परीक्षक(CAG ) की नियुक्ति.
क:-वित् आयोग,भाषा आयोग,राज्यपाल etc .
३) अध्यादेश जारी कर सकता है जो संसद अधिनियम के सामान होता है.
ये सरे वही पद या कार्य है जो किसी भी सरकार को मोनिटर करते है या मनमानी करने से रोकते है.जब ये पद राष्ट्रपति के मरजी से भरे जायेंगे बजाये राजनीतिक दलों के तो मोनिटरिंग और मजबूत होगी और भर्ष्टाचार ,राजनीतिक तानाशाही और मनमाने निर्णय पर भी रोक लगेगा.
अतः अगर राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के बजाये आम जनता द्वारा चुना जाये तो ये रबर का स्टंप एक मजबूत प्रहरी बन सकता है लोकतंत्र का.

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