शनिवार, 30 जून 2012

हिंदुस्तान की राजनीती एक आपात से गुजर रही है.
सत्ता पक्ष जहाँ मनमानी पे तुला हुआ है वही बिखरा विपक्ष कोई विकल्प देने में अक्षम है.
लोकतंत्र सिर्फ किताबो में सिमटा हुआ है ऐसे में आम जनता के हित संविधान की आड़ में झुलसता जा रहा है. क्या हमें अब भी जरुरत नहीं की ऐसी आपदा से बचने के लिए एक बदलाव से गुजरे?
संसद की गरिमा और लोकतंत्र की दुहाई देकर जनता के हितो से कब तक खेला जायेगा?
क्या कोई एक ऐसा नहीं होना चाहिए जो किसी भी पार्टी से न हो और जनता के हितो का रखवाला हो.
हमारा संविधान इस परिश्थिति से निपटने में कारगर नहीं हो पा रहा है. इसलिए जरुरी है की राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता करे और उम्मीदवार किसी पार्टी विशेष न हो.

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